Tulsidas jeevan Parichay

Tulsidas Ji Ka Jeevan Parichay – जिन्होंने राम भक्ति से बदला समाज का स्वरूप

गोस्वामी तुलसीदास जी भारतीय साहित्य के उन महान कवियों में से एक हैं जिन्होंने ‘रामचरितमानस’ जैसी अमर कृति की रचना की।
इस लेख में हम तुलसीदास जी के जीवन (Tulsidas Ji Ka Jeevan parichay), जन्म, शिक्षा, विवाह और रचनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे — और समझेंगे कि उन्होंने भक्ति के मार्ग को कैसे सरल बनाया।

🕉️ गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन परिचय

भारत की पवित्र भूमि पर समय-समय पर कई महान संतों ने जन्म लिया जिन्होंने मानव कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्हीं में से एक थे गोस्वामी तुलसीदास जी, जिन्होंने सरल भाषा में भगवान राम की कथा लिखकर पूरे समाज को धर्म और आचरण का मार्ग दिखाया।
उनकी रचनाओं ने भक्तिभाव को जन-जन तक पहुँचाया और उन्हें “राम भक्त कवि” के रूप में अमर कर दिया।

🌿 तुलसीदास जी का जन्म और प्रारंभिक जीवन

तुलसीदास जी का जन्म और मृत्यु के वर्ष को लेकर मतभेद हैं, लेकिन गीता प्रेस के अनुसार उनका जन्म सन् 1554 (संवत 1554 श्रावण के शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन) में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के राजापुर ग्राम में हुआ।
उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी देवी था।
जन्म के समय उनका शरीर सामान्य शिशु जैसा नहीं था, जिससे माता-पिता भयभीत हो गए। बाद में उनकी देखभाल एक दासी चुनिया ने की। बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो गया, और तुलसीदास अनाथ हो गए।

🪶 तुलसीदास जी का बचपन और शिक्षा

भगवान शिव की कृपा से संत नरहर्यानंद जी ने उन्हें आश्रय दिया और नाम रखा रामबोला
प्रारंभिक शिक्षा अयोध्या में हुई, जहाँ वे अत्यंत बुद्धिमान और स्मरणशक्ति वाले शिष्य थे।
आगे की शिक्षा के लिए वे काशी चले गए और वहाँ शेष सनातन जी से वेद, वेदांत और शास्त्रों का अध्ययन किया।

फिर वह अपने गुरु से आज्ञा लेकर के अपने जन्मभूमि चित्रकूट वापस आ गए और वहीं पर रहकर के सभी लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे।

💍 तुलसीदास जी का विवाह और वैराग्य

संवत 1583 में तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली देवी से हुआ। वे बहुत सुखी पूर्वक अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन का निर्वाह कर रहे थे।

एक दिन जब उनकी पत्नी मायके चली गईं तो वे भी पीछे-पीछे पहुँच गए।
पत्नी रत्नावली ने कहा — “मेरे इस देह में जितनी आसक्ति है, उतनी अगर भगवान में होती तो तुम मोक्ष पा जाते।”

इन शब्दों ने तुलसीदास जी का जीवन बदल दिया। उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और साधु बनकर प्रयाग और फिर काशी चले गए।

🙏 तुलसीदास जी को हनुमान और श्रीराम के दर्शन

काशी में रामकथा कहते हुए तुलसीदास जी को एक प्रेत ने हनुमान जी का पता बताया। तुलसीदास जी राम के दर्शन की मन में आस लिए हनुमान जी से मिलने चले गए।
हनुमान जी से मिलकर उन्होंने भगवान श्रीराम के दर्शन की इच्छा जताई।
हनुमान जी ने कहा —“चित्रकूट जाओ, वहीं तुम्हें प्रभु के दर्शन होंगे।”

चित्रकूट पहुँचने पर संवत 1607 की मौनी अमावस्या के दिन भगवान राम ने बालक के रूप में उन्हें दर्शन दिए।
हनुमान जी ने यह दोहा कहा — चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसे तिलक देते रघुवीर।

तुलसीदास जी तुरंत इस दोहे का मतलब समझ गए वह अविरल उस अदभूत छवि को निहारते रहे और खुद अपनी सुधि भूल गए। भगवान ने अपने हाथ से चंदन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और उसके बाद फिर वह अंतर ध्यान हो गए।

📜 रामचरितमानस की रचना

काशी में रहते हुए तुलसीदास जी के अंदर कविता लिखने की शक्ति का संचार हुआ। वे संस्कृत में पद्य की रचना करने लगे। वह जो भी वह पद्य की रचना करते, रात्रि में वह विलुप्त हो जाती। फिर एक दिन स्वप्न में भगवान शिव और माता पार्वती ने उनको दर्शन दिया और उनसे कहा कि “तुम अपने भाषा में काव्य की रचना करो”।फिर तुलसीदास काशी से अयोध्या चले गए।

भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद और हनुमान जी की आज्ञा से तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना आरंभ की।
रचना पूर्ण होने में लगभग 2 वर्ष 7 महीने 26 दिन लगे।
रचना पूर्ण होने के बाद जब इसे काशी विश्वनाथ मंदिर में रखा गया, तो सुबह मंदिर के द्वार खुलने पर पंडितों ने देखा —

“श्री रामचरितमानस” के ऊपर लिखा था — सत्यम् शिवम् सुंदरम्।

इससे सभी पंडित काफी अचंभित हुए और बड़े लज्जित भी। उन्होंने अपने कृत्य के लिए तुलसीदास जी से क्षमा मांगी l

✍️ तुलसीदास जी की प्रमुख रचनाएँ

तुलसीदास जी ने अपने जीवन में अनेक काव्य रचनाएँ कीं, जिनमें से प्रमुख हैं —

  • श्री रामचरितमानस
  • हनुमान चालीसा
  • विनय पत्रिका
  • कवितावली
  • गीतावली
  • हनुमान बाहुक
  • संकटमोचन स्तोत्र
  • हनुमान आरती

इन सभी रचनाओं ने भक्तिभाव, नीति और रामत्व का प्रचार किया।

🕯️ तुलसीदास जी का अंतिम समय

जीवन के अंतिम वर्षों में तुलसीदास जी काशी के अस्सी घाट पर रहे।
वहीं पर उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की और संवत 1680 में “राम-राम” कहते हुए देह त्याग किया।

🌸 निष्कर्ष

गोस्वामी तुलसीदास जी न केवल एक कवि थे, बल्कि धर्म, भक्ति और मानवता के मार्गदर्शक भी थे।
उनकी रचनाएँ आज भी हर घर में पढ़ी जाती हैं और भक्ति के भाव को जीवित रखती हैं।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है, जो मनुष्य को भीतर से परिवर्तित कर दे।

🧭 FAQ

1️⃣ गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म संवत 1554 (सन् 1554 ई.) में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के राजापुर ग्राम में हुआ था।
उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी देवी था।

2️⃣ तुलसीदास जी की पत्नी कौन थीं और उनका जीवन कैसे बदला?

तुलसीदास जी की पत्नी का नाम रत्नावली देवी था।
जब तुलसीदास जी अपनी पत्नी के पीछे मायके पहुँचे, तब रत्नावली ने कहा —

“मेरे इस शरीर में जितनी आसक्ति है, उतनी अगर भगवान में होती तो तुम्हारा बेड़ा पार हो गया होता।”
इन शब्दों ने तुलसीदास जी को वैराग्य की ओर प्रेरित किया और उन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर भक्ति मार्ग अपना लिया।

3️⃣ तुलसीदास जी की प्रमुख रचनाएँ कौन-कौन सी हैं?

तुलसीदास जी की प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं —

  • श्रीरामचरितमानस
  • हनुमान चालीसा
  • विनय पत्रिका
  • कवितावली
  • गीतावली
  • हनुमान बाहुक
  • संकटमोचन स्तोत्र
    इन सभी रचनाओं ने भक्ति और धर्म का अद्भुत संदेश दिया है।

4️⃣ तुलसीदास जी को हनुमान और श्रीराम के दर्शन कैसे हुए?

काशी में रामकथा कहते हुए तुलसीदास जी को एक प्रेत ने हनुमान जी का पता बताया।
हनुमान जी से मिलने के बाद उन्होंने भगवान श्रीराम के दर्शन की इच्छा जताई।
हनुमान जी ने कहा — “चित्रकूट जाओ।”
वहीं संवत 1607 की मौनी अमावस्या को तुलसीदास जी को भगवान राम ने बालक रूप में दर्शन दिए।

5️⃣ तुलसीदास जी की मृत्यु कब और कहाँ हुई?

गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने अंतिम दिन काशी के अस्सी घाट पर व्यतीत किए।
वहीं पर उन्होंने “राम-राम” कहते हुए संवत 1680 (सन् 1623 ई.) में शरीर त्याग किया।
उनकी समाधि वाराणसी के अस्सी घाट पर स्थित है।

यह तुलसीदास जी के जीवन से जुड़ी हुई कुछ रोचक बातें थी, इसी क्रम में आगे आपको रामचरितमानस से जुड़ी विशेष जानकारी मिलेगी।

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