अयोध्या के रामकथा मण्डलों में एक प्रश्न अक्सर उठता था— “Ram Bade ya Ram Ka Naam” (राम बड़े या राम का नाम) ?” यह प्रश्न नया नहीं था। संतों और ऋषियों के बीच यह चर्चा सदियों से चली आ रही है। एक बार एक ज्ञानी आचार्य अयोध्या में कथा सुना रहे थे। उनके सामने अनेक श्रोता बैठे थे—गृहस्थ, साधु, विद्यार्थी, और कुछ विद्वान पंडित भी। कथा के बीच एक पंडित ने प्रश्न उठाया— “आचार्य जी, हम सब भगवान राम के उपासक हैं। परंतु संत लोग कहते हैं कि राम से अधिक राम-नाम है। यह कैसे संभव है? क्या भगवान स्वयं अपने नाम से छोटे हो सकते हैं?” आचार्य मुस्कराए। उन्होंने उत्तर देने की जल्दी नहीं की। पहले उन्होंने रामचरितमानस बाल कांड का प्रसिद्ध दोहा सुनाया— “राम ते अधिक राम-कर-नामा। अखिल विश्व में बेद प्रनामा॥” (बालकांड) फिर बोले— “यह तुलसीदास जी की संपूर्ण भक्ति-दृष्टि का सार है। समझने के लिए हमें शास्त्रों में जाना होगा।”
🕉️ 1. सेतु-निर्माण: नाम की प्रत्यक्ष महिमा
आचार्य ने पहला प्रमाण दिया— लंका तक पहुंचने के लिए वानर सेना ने समुद्र पर पुल बनाया। परंतु वहाँ एक आश्चर्य हुआ। जब पर्वत-तुल्य वानर बड़े-बड़े पत्थर समुद्र में फेंकते थे… वे डूब जाते थे। फिर राम-नाम लिखकर पत्थर जल पर तैरने लगे। क्योंकि नाम शक्ति है, जो रूप को भी पार कर देती है।” यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण और कई पुराणों में मिलता है। आचार्य बोले— “यहां भी नाम ने वह किया, जो स्वयं राम के हाथों से भी नहीं हुआ — क्योंकि राम ने पत्थर नहीं फेंके, पर वानरों के हाथों नाम ने चमत्कार कर दिया।”
🕉️ 2. शिवजी का राम-नाम पर विश्वास
फिर आचार्य ने अगला प्रमाण दिया— “शिव महादेव, जो स्वयं देवों के देव हैं, वे राम नाम के महत्त्व का उपदेश पार्वती जी को देते हैं।” उन्होंने मानस का चौपाई-पद पढ़ा— “मंत्र महामनि बिपुल अनूपा। सम तें अधिक न राम जप रूपा॥” (बालकांड) अर्थ — असंख्य मन्त्र हैं, पर उनमें सर्वश्रेष्ठ राम-नाम का जप है। आचार्य बोले— “जब शिव जैसे महादेव राम नाम का महिमा गाते हैं, तो हम साधारण मनुष्य कैसे संदेह कर सकते हैं?”
🕉️ 3. भक्त प्रहलाद और नाम-शक्ति
फिर उन्होंने एक पुराणिक संदर्भ दिया— “नारद पुराण में कहा गया है कि नाम जप ही वह शक्ति है जिसने प्रहलाद को अग्नि, जल और तीक्ष्ण अस्त्रों से बचाया। तब प्रहलाद ने भगवान का रूप देखा नहीं था, पर नाम का सहारा था।” आचार्य बोले— “यही कारण है कि नाम कालातीत है, जबकि रूप केवल अवतार काल में प्रकट होता है।”
🕉️ 4. राम स्वयं ‘नाम’ की महिमा बताते हैं
कथा में आगे आचार्य बोले— “कई ग्रंथों में यह प्रसंग आता है कि भगवान राम ने स्वयं शाबरि से कहा — ‘भक्ति का सर्वोच्च मार्ग नाम-स्मरण है।’ क्योंकि नाम हमेशा उपलब्ध है, कहीं भी, किसी भी समय।”
✨ फिर आचार्य ने प्रश्नकर्ता पंडित की ओर देखकर कहा—
“देखिए, बात बहुत सरल है।” “राम अवतारी हैं — एक समय में, एक रूप में। परंतु राम नाम अनंत है, शाश्वत है, निराकार शक्ति है।” उन्होंने एक सुंदर उदाहरण दिया— “जैसे सूर्य की आकार सीमा है, पर सूर्य प्रकाश की कोई सीमा नहीं। राम रूप सूर्य है, और राम नाम सूर्य का प्रकाश।”
🕉️ 5. निष्कर्ष — नाम ही राम तक पहुँचने का माध्यम
आचार्य ने कहा— “संतों ने कभी यह नहीं कहा कि राम से बढ़कर कोई है। उन्होंने कहा — राम तक पहुँचने का सबसे सरल, शक्तिशाली और सुलभ मार्ग राम नाम है। राम रूप दुर्लभ है, पर राम नाम सर्वसुलभ है। राम रूप एक है, पर नाम करोड़ों जिह्वाओं पर एक साथ जापित हो सकता है। राम रूप का दर्शन कठिन है, पर नाम का स्मरण हर क्षण संभव है।”
🌺 कथा का सार
अंत में आचार्य ने वही दोहा दुहराया— “राम ते अधिक राम-कर-नामा।” और कहा— “संदेश स्पष्ट है— राम और राम नाम अलग नहीं हैं। पर भक्त के अनुभव में, नाम सहज है, शीघ्र है और अनंत फल देने वाला है। इसलिए नाम को अधिक महिमा दी जाती है।”
FAQ
1. तुलसीदास जी ने “राम ते अधिक राम कर नामू” क्यों कहा?
क्योंकि राम रूप अवतार-काल तक सीमित है, पर राम नाम अनंत, शाश्वत और सर्वव्यापी है। महिमा उसी की अधिक मानी गई है जो हर समय उपलब्ध रहे।
2. क्या शिवजी भी राम नाम की महिमा बताते हैं?
हाँ। रामचरितमानस के बालकांड में शिवजी कहते हैं— “सम तें अधिक न राम जप रूपा।” अर्थ: सभी मंत्रों से श्रेष्ठ राम नाम जप है।
3. क्या राम नाम केवल भक्तों के लिए है या सभी के लिए?
राम नाम सर्वधर्मसमभाव है। किसी भी व्यक्ति, किसी भी स्थिति, किसी भी समय और किसी भी भाव से इसे जपा जा सकता है — यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
4. क्या राम रूप और राम नाम अलग हैं?
नहीं। रूप और नाम दोनों एक ही दिव्य शक्ति के प्रकट रूप हैं। परंतु अनुभव में — भक्त के लिए नाम स्मरण आसान है, इसलिए नाम को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
5. क्या केवल राम नाम जप से ही भक्ति सिद्ध हो जाती है?
हाँ। शास्त्र कहते हैं कि नाम जप → मन की शुद्धि → भक्ति → ईश्वर-प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है। विशेषतः कलियुग में “नाम-स्मरण” ही परम फलदायक माना गया है।
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