गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरितमानस भारतीय भक्ति साहित्य का अनुपम ग्रंथ है। इसमें बालकाण्ड में भगवान शिव और माता सती का संवाद तथा Mata sati dwara ram ki pariksha का प्रसंग अत्यंत शिक्षाप्रद रूप से वर्णित है।यह प्रसंग न केवल भक्ति का संदेश देता है, बल्कि भक्त के मन के संदेह और श्रद्धा के बीच के द्वंद्व को भी स्पष्ट करता है। हनुमानप्रसाद पोद्दार जी ने इस प्रसंग की टीका में गहन भावों को सरल शब्दों में समझाया है। आइए इस प्रसंग को क्रमबद्ध समझें।
प्रसंग की पृष्ठभूमि
लंकाधिपति रावण द्वारा सीता-हरण के पश्चात भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता की खोज में वन-वन भटक रहे हैं। यह देखकर सती जी के मन में संदेह उत्पन्न हुआ कि यदि श्रीराम सचमुच सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं, तो उन्हें सीता की खोज की क्या आवश्यकता? इसी शंका के कारण सती जी ने राम की परीक्षा लेने का विचार किया।
शिव का निषेध और सती का संकल्प
जब सती ने यह इच्छा भगवान शिव को बताई, तो शिवजी ने उन्हें रोका और कहा कि — “सुनु गिरिजा, रघुनाथ कृपा निधान हैं। वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं, उनकी परीक्षा लेना उचित नहीं है।” परंतु सती जी के मन में संदेह बना रहा और उन्होंने शिव के वचन न मानकर परीक्षा लेने का संकल्प कर लिया, और राम की परीक्षा के लिए अपनी माया लीला में सीता का रूप धारण कर राम के निकट पहुँच जाती हैं।
सती का रूप-परिवर्तन (दोहा 49–51)
सती ने सीता का रूप धारण कर लिया और राम के समीप जाकर खड़ी हो गईं। वे देखना चाहती थीं कि क्या राम उन्हें पहचान लेंगे या नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि —
- राम ने सती को देखते ही पहचान लिया कि ये माता सती हैं, जिन्होंने सीता का रूप धारण किया है।
- वे मुस्कराते हुए बोले — “माता, आप यहाँ क्यों आई हैं?”
इस एक वाक्य से ही सती का हृदय काँप उठा। यह शब्द सती के हृदय में गहरे छिपे प्रेम और श्रद्धा के भावों को प्रकट कर देता है। उनका हृदय काँप उठता है और वे लज्जित हो जाती हैं। यह घटना दर्शाती है कि भगवान अपने भक्तों के हृदय तक की गहराई को समझते हैं।
सती का लज्जित होना (दोहा 52–53)
जब श्रीराम ने उन्हें “माता” कहकर संबोधित किया, तो सती जी को अत्यंत लज्जा का अनुभव हुआ। उनके मन में खेद हुआ कि शिवजी ने ठीक ही कहा था और मैंने उनके वचन का पालन नहीं किया। हनुमानप्रसाद पोद्दार जी लिखते हैं कि —
- यह प्रसंग दर्शाता है कि ईश्वर सर्वज्ञ हैं और भक्त की अंतरात्मा तक को भली-भांति जानते हैं।
- परीक्षा लेने का अर्थ है भगवान के स्वरूप पर संदेह करना, और यही सती से भूल हुई।
शिव का त्याग (दोहा 54–55)
सती अपने अपराध-बोध के साथ शिवजी के पास लौटीं। उन्होंने सारा प्रसंग बताने में संकोच किया और सत्य को छिपा लिया। लेकिन शिवजी तो सर्वज्ञ थे, उन्होंने सती का मन जान लिया और यह निश्चित कर लिया कि — “अब सती मेरे लिए त्याज्य हो गई हैं। क्योंकि राम की आज्ञा से ही मैंने उन्हें माता रूप में स्वीकार किया है।” शिवजी ने सती का त्याग किया और उनका मन श्रीराम के ध्यान में लीन हो गया। वे समाधि में बैठकर केवल राम का चिंतन करने लगे।
आध्यात्मिक अर्थ
हनुमानप्रसाद पोद्दार जी इस प्रसंग की टीका में बताते हैं कि:
- ईश्वर की परीक्षा लेना अनुचित है। जब तक मन में संदेह है, तब तक भक्ति का रस नहीं मिल सकता।
- शिव का आचरण आदर्श है। उन्होंने राम के आदेशानुसार सती को माता मान लिया और तत्पश्चात किसी प्रकार का कपट या मोह नहीं रखा।
- यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चे भक्त के लिए भगवान का वचन अंतिम सत्य होता है।
- सती का यह व्यवहार उनके अगले जन्म का कारण बना, जब वे पार्वती के रूप में प्रकट हुईं और पुनः कठोर तप करके शिव को प्राप्त किया।
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निष्कर्ष
बालकाण्ड के इस प्रसंग से हमें एक गहरा संदेश ये मिलता है –
- सती की शंका हमें यह समझाती है कि संदेह भक्ति का सबसे बड़ा बाधक है।
- राम का व्यवहार दिखाता है कि भगवान भक्त की हर परीक्षा और हर भाव को जानते हैं।
- शिव का त्याग और समाधि यह दर्शाता है कि सच्चा भक्त मोह-माया से ऊपर उठकर केवल प्रभु के ध्यान में लीन रहता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अद्भुत प्रसंग के माध्यम से यह शिक्षा दी है कि भक्ति में विश्वास और समर्पण अनिवार्य है। हनुमानप्रसाद पोद्दार जी की टीका इसे और स्पष्ट करती है कि यह प्रसंग केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा देने वाला आदर्श है।
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