Who Am I? मैं कौन हूँ? – भगवान श्री रमण महर्षि की पुस्तक | आत्म-विचार हिंदी में

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प्रस्तावना: आत्म-खोज की सबसे सरल साधना

भगवान श्री रमण महर्षि की प्रसिद्ध पुस्तक “मैं कौन हूँ?” (Who Am I?) आध्यात्मिक जगत की उन दुर्लभ कृतियों में से एक है, जो बिना किसी जटिल दर्शन या कर्मकांड के सीधे आत्मा की ओर ले जाती है। यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीने और अनुभव करने के लिए है।

इस पुस्तक में आत्म-साक्षात्कार की जिस सरल विधि का वर्णन है, उसे आत्म-विचार (Self Enquiry) कहा जाता है। महर्षि रमण कहते हैं कि मनुष्य का सारा दुख केवल एक ही प्रश्न का उत्तर न जानने से है –
“मैं कौन हूँ?”

यह लेख इसी पुस्तक के सार, दर्शन और साधना-पद्धति को सरल हिंदी में प्रस्तुत करता है, ताकि सामान्य पाठक भी इसे समझकर अपने जीवन में उतार सके।

भगवान श्री रमण महर्षि: जीवन परिचय और आत्म-अनुभूति

भगवान श्री रमण महर्षि का जन्म 1879 ई. में तमिलनाडु के तिरुचुली नामक स्थान पर हुआ था। उनका पूर्व नाम वेंकटरामन अय्यर था।

मृत्यु-अनुभव से आत्म-ज्ञान तक

केवल 16 वर्ष की आयु में उन्हें एक तीव्र मृत्यु-भय का अनुभव हुआ। उन्होंने स्वयं से पूछा – “अगर यह शरीर मर रहा है, तो मरने वाला कौन है?”

इसी आत्म-चिंतन में उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप – शुद्ध चैतन्य आत्मा – का साक्षात्कार हो गया। इसके बाद वे अरुणाचल पर्वत (तिरुवन्नामलाई) पहुँचे और वहीं जीवनभर मौन साधना में रहे।

“मैं कौन हूँ?” पुस्तक कैसे बनी?

यह पुस्तक किसी परंपरागत ग्रंथ की तरह नहीं लिखी गई।
वास्तव में यह श्री रमण महर्षि से उनके शिष्यों द्वारा पूछे गए 28 प्रश्नों और उनके उत्तरों का संग्रह है।

एक शिष्य ने पूछा: “सभी लोग सुख चाहते हैं, लेकिन वह मिलता क्यों नहीं?”

महर्षि का उत्तर था: “सुख बाहर नहीं, स्वयं के भीतर है। उसे जानने का उपाय आत्म-विचार है।”

यही आत्म-विचार इस पुस्तक का मूल संदेश है।

पुस्तक का मूल दर्शन: अद्वैत वेदांत की सरल अभिव्यक्ति

“मैं कौन हूँ?” अद्वैत वेदांत का अत्यंत सरल रूप है।
महर्षि कहते हैं – अहंकार का नाश ही मुक्ति है।

जब ‘मैं’ की झूठी पहचान (शरीर-मन) मिट जाती है, तब केवल आत्मा शेष रहती है।

“मैं कौन हूँ?” – नकार की प्रक्रिया (Neti-Neti)

पुस्तक का पहला ही प्रश्न साधक को झकझोर देता है – मैं कौन हूँ?

इसका उत्तर खोजने के लिए महर्षि पहले बताते हैं कि मैं क्या नहीं हूँ

1. स्थूल शरीर मैं नहीं हूँ

शरीर पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है।
यह जन्म लेता है, बढ़ता है और नष्ट हो जाता है।
जो नश्वर है, वह ‘मैं’ नहीं हो सकता।

2. ज्ञानेंद्रियाँ मैं नहीं हूँ

कान, आँख, त्वचा, जिह्वा और नाक – ये तभी काम करती हैं जब वस्तु सामने हो।
इनमें स्वयं कोई चेतना नहीं है।

3. कर्मेंद्रियाँ मैं नहीं हूँ

वाणी, हाथ, पैर, पायु, उपस्थ – ये केवल क्रिया करती हैं, जानती नहीं।

4. पाँच प्राण भी मैं नहीं हूँ

प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – ये शरीर की व्यवस्था चलाते हैं, पर स्वयं ज्ञाता नहीं हैं।

5. मन और विचार भी मैं नहीं हूँ

विचार आते-जाते रहते हैं।
जो देखा जा सकता है, वह देखने वाला नहीं हो सकता।

तब मैं कौन हूँ? – सत्-चित्-आनंद स्वरूप आत्मा

इन सबका निषेध करने पर जो शेष बचता है, वही चैतन्य आत्मा है।
यही आत्मा सत् (अस्तित्व), चित् (चेतना) और आनंद का स्वरूप है।

महर्षि कहते हैं: “सच्चा सुख आत्म-ज्ञान में है, न कि बाहरी वस्तुओं में।”

जगत और माया का रहस्य

‘जगत’ शब्द ही अपने आप में सत्य बताता है –

  • – उत्पन्न होना

  • – नष्ट होना

  • – आना-जाना

जो निरंतर बदल रहा है, वह स्थायी सत्य नहीं हो सकता।

जब तक हम जगत को ही सत्य मानते हैं, तब तक सुख-दुख का चक्र चलता रहता है।
अध्यात्म हमें दृष्टिकोण बदलना सिखाता है।

गीता और मन का नियंत्रण

भगवद्गीता के छठे अध्याय में अर्जुन कहते हैं: “हे कृष्ण! मन अत्यंत चंचल है।”

भगवान श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं: “अभ्यास और वैराग्य से ही मन वश में होता है।”

यही बात रमण महर्षि भी कहते हैं।

आत्म-विचार (Self Enquiry) की अभ्यास विधि

अभ्यास कैसे करें?

जब कोई विचार आए –
“मुझे दुख है”
तो पूछें –
यह विचार किसे आया?
उत्तर होगा – “मुझे।”

फिर पूछें –
यह ‘मैं’ कौन हूँ?

विचार को उसके स्रोत तक ले जाएँ।

महत्वपूर्ण निर्देश

  • मन को बहिर्मुखी से अंतर्मुखी करें

  • विचारों से लड़ें नहीं, उन्हें मूल में विलीन होने दें

  • जैसे लहरें समुद्र में समा जाती हैं, वैसे विचार ‘मैं’ में लीन हो जाते हैं

मन, चित्त और तीन अवस्थाएँ

  • जाग्रत – मन बाहर की ओर

  • स्वप्न – मन भीतर की ओर

  • सुषुप्ति – मन लीन

गहरी नींद में सुख मिलता है क्योंकि मन नहीं होता, पर चेतना बनी रहती है
इससे सिद्ध होता है कि चेतना ही सत्य है

मौन का महत्व

महर्षि रमण कहते हैं: “मौन ही परम भाषा है।”

सच्चा ज्ञानी बिना बोले सब कुछ कह देता है।

इस साधना के लाभ: शांति और मुक्ति

  • मानसिक तनाव से मुक्ति

  • भय और दुख का अंत

  • सभी में एक ही आत्मा का दर्शन

  • जीवित रहते हुए मुक्ति (जीवन्मुक्ति)

आज के तनावपूर्ण जीवन में भी 5–10 मिनट का आत्म-विचार अद्भुत शांति देता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

“मैं कौन हूँ?” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन-परिवर्तन की साधना है।
यह प्रश्न जितना गहरा होगा, उत्तर उतना ही मौन होगा।

इस पुस्तक को अलमारी में न रखें,
बल्कि हर क्षण स्वयं से पूछते रहें –
मैं कौन हूँ?

यही प्रश्न आपको स्वयं से मिला देगा।

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FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. “मैं कौन हूँ?” पुस्तक किसने लिखी?

भगवान श्री रमण महर्षि की शिक्षाओं पर आधारित यह पुस्तक उनके शिष्यों द्वारा संकलित प्रश्न-उत्तर रूप में है।

Q2. क्या यह पुस्तक शुरुआती साधकों के लिए है?

हाँ, यह आत्म-ज्ञान की सबसे सरल और प्रभावी विधि बताती है।

Q3. आत्म-विचार और ध्यान में क्या अंतर है?

ध्यान में किसी वस्तु पर एकाग्रता होती है, जबकि आत्म-विचार में ‘मैं’ की खोज होती है।

Q4. क्या भक्ति आवश्यक है?

महर्षि कहते हैं – भक्ति और ज्ञान अंत में एक ही हो जाते हैं।

Q5. क्या गृहस्थ व्यक्ति यह साधना कर सकता है?

बिल्कुल। यह साधना जीवन के बीच में रहकर की जा सकती है।

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